॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

॥ चौपाई ॥
जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
चारि भुजा तनु श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि साजै॥
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
कुण्डल श्रवण चमकते काला।
हिये माल मुक्तन मणि माला॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करे अरिहिं संहारा॥
पिंगल कृष्ण छाया नंदन।
यम कोणस्थ रौद्र दुख भंजन॥
सौरी मंद शनैश्चर नामा।
भानु पुत्र पूजत सब कामा॥
जाके दृष्टि पड़ी जग माहीं।
कष्ट विपत्ति घटे तन माहीं॥
धनहीन को धन देत सदाहीं।
रोगी को तन निरोग कराहीं॥

जो यह शनि चालीसा गावे।
मन वांछित फल वह नर पावे॥
संकट कटे मिटे सब पीरा।
जो सुमिरे शनि देव अधीरा॥
दुष्ट नाश करि शांति दिहावै।
भक्त जनन पर कृपा बरसावै॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
तापर शनि कृपा बरसाई॥
जय जय जय शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

॥ दोहा ॥
जो यह शनि चालीसा पढ़े, प्रेम सहित मन लाई।
सकल कष्ट दूर हो, सुख संपत्ति घर आई॥
🙏 जय श्री शनिदेव 🙏
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