Home ChalisaShree Ram Chalisa – Sampark Gujarati

Shree Ram Chalisa – Sampark Gujarati

by samparkgujarati
0 comments 15 views

॥ दोहा ॥

श्री रघुबीर भक्त हितकारी।

सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

निशिदिन ध्यान धरै जो कोई।

ता सम भक्त और नहिं होई॥

image 13

॥ चौपाई ॥

ध्यान धरें शिवजी मन माहीं।

ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं॥1॥

जय जय जय रघुनाथ कृपाला।

सदा करो संतजन प्रतिपाला॥2॥

दूत तुम्हार वीर हनुमाना।

जासु प्रभाव तिहुँ पुर जाना॥3॥

तव भुजदंड प्रचंड कृपाला।

रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥4॥

तुम अनाथ के नाथ गोसाईं।

दीनन के हो सदा सहाई॥5॥

ब्रह्मादिक तव पार न पावैं।

सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥6॥

चारों वेद भरत हैं साखी।

तुम भक्तन की लज्जा राखी॥7॥

गुण गावत शारद मन माहीं।

सुरपति ताको पार न पाहीं॥8॥

नाम तुम्हार लेत जो कोई।

ता सम धन्य और नहिं होई॥9॥

राम नाम है अपरम्पारा।

चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥10॥

image 14

गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो।

तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥11॥

शेष रटत नित नाम तुम्हारा।

महि को भार शीश पर धारा॥12॥

फूल समान रहत सो भारा।

पावत कोउ न तुम्हरो पारा॥13॥

भरत नाम तुम्हरो उर धारो।

तासों कबहुँ न रण में हारो॥14॥

नाम शत्रुघ्न हृदय प्रकाशा।

सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥15॥

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी।

सदा करत संतजन रखवारी॥16॥

तातें रण जीते नहिं कोई।

युद्ध जुरे यमहु किन होई॥17॥

महालक्ष्मी धर अवतारा।

सब विधि करत पाप को छारा॥18॥

सीता राम पुनीता गायो।

भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥19॥

घट सो प्रकट भई सो आई।

जाको देखत चंद्र लजाई॥20॥

सो तुमरे नित पांव पलोटत।

नवो निद्धि चरणन में लोटत॥21॥

सिद्धि अठारह मंगलकारी।

सो तुम पर जावै बलिहारी॥22॥

औरहु जो अनेक प्रभुताई।

सो सीतापति तुमहिं बनाई॥23॥

इच्छा ते कोटिन संसारा।

रचत न लागत पल की बारा॥24॥

जो तुम्हरे चरणन चित लावै।

ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥25॥

सुनहु राम तुम तात हमारे।

तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥26॥

तुमहिं देव कुल देव हमारे।

तुम गुरु देव प्राण से प्यारे॥27॥

जो कुछ हो सो तुम ही राजा।

जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥28॥

राम आत्मा पोषण हारे।

जय जय दशरथ राज दुलारे॥29॥

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा।

नमो नमो जय जगपति भूपा॥30॥

image 15

धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा।

नाम तुम्हार हरत संतापा॥31॥

सत्य शुद्ध देवन मुख गाया।

बजी दुंदुभी शंख बजाया॥32॥

सत्य सत्य तुम सत्य सनातन।

तुम ही हो हमरे तन मन धन॥33॥

याको पाठ करे जो कोई।

ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥34॥

आवागमन मिटै तिहि केरा।

सत्य वचन माने शिव मेरा॥35॥

और आस मन में जो होई।

मनवांछित फल पावै सोई॥36॥

तीनहु काल ध्यान जो लावै।

तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥37॥

साग पत्र सो भोग लगावै।

सो नर सकल सिद्धता पावै॥38॥

अंत समय रघुवरपुर जाई।

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥39॥

श्री हरिदास कहै अरु गावै।

सो बैकुंठ धाम को पावै॥40॥

image 16

॥ दोहा ॥

सप्त दिवस जो नेम कर, पाठ करै चित लाय।

हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥

🙏 जय श्री राम 🙏

Subscribe Now  For More articles.

You may also like

Leave a Comment